Tuesday, July 21, 2009

PRAHLAD SINGH PATEL START NASHA MUKTI ABHIYAN IN NARSINGHPUR









Monday, July 20, 2009

India key player for global food security

New Delhi (IANS) Praising India's rich knowledge in agriculture, Secretary of State Hillary Clinton on Sunday said India is a key player in helping the US achieve global food security and end hunger.
"President Obama and I had a signature issue - food security and ending hunger. India is well placed to help us (achieve it)," Clinton said at the National Agricultural Science Centre that is part of the Indian Agricultural Research Institute (IARI) here.
"The problem of chronic hunger and malnutrition is a huge issue. (Currently) one billion people are hungry in the world. It can undermine peace and instability can follow. We believe that world has the resources to feed all people.
"I am delighted to be in this prestigious institute and partner India in agriculture. India's experience in agriculture is unsurpassable. With only three percent of the land area, it feeds 17 percent of (global) people. India's leadership is crucial," she added
She said the US administration is happy to partner India in agriculture.
"Agriculture is a pillar of our five pillar discussion (with India). We want to expand our partnership to produce better seeds, grains, farm technology. There is no limit to new explorations in agriculture with India. I am committed to this effort," Ms. Clinton said while alluding to the US role in spurring a green revolution in India in the 1960s that was marked by the introduction of high-yield seed varieties leading to enhanced farm productivity.
She said bio-energy, bio-security, bio-diversity are key areas. The effort is to "end hunger". She also said that India can play a great role in food processing industry.
Ms. Clinton was received at the institute by Agriculture Minister Sharad Pawar. Enhanced cooperation in agriculture will be one of the areas of discussions between Clinton and External Affairs Minister S.M. Krishna Monday.

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्ठा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचितवक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पष्ठों पर मुखर है।
हिन्दी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का परचम चंहुदिश फैल रहा है।

भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का आरम्भ और हिन्दी पत्रकारिता
भारतवर्ष में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हुआ। 1780 ई. में प्रकाशित हिके (Hickey) का "कलकत्ता गज़ट" कदाचित् इस ओर पहला प्रयत्न था। हिंदी के पहले पत्र उदंत मार्तण्ड (1826) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लोइंडियन अंग्रेजी पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी।
इन अंतिम वर्षों में फारसी भाषा में भी पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। 18वीं शताब्दी के फारसी पत्र कदाचित् हस्तलिखित पत्र थे। 1801 में हिंदुस्थान इंटेलिजेंस ओरिऐंटल ऐंथॉलॉजी (Hindusthan Intelligence Oriental Anthology) नाम का जो संकलन प्रकाशित हुआ उसमें उत्तर भारत के कितने ही "अखबारों" के उद्धरण थे। 1810 में मौलवी इकराम अली ने कलकत्ता से लीथो पत्र "हिंदोस्तानी" प्रकाशित करना आरंभ किया। 1816 में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने "बंगाल गजट" का प्रवर्तन किया। यह पहला बंगला पत्र था। बाद में श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचारपत्र "समाचार दर्पण" को (27 मई, 1818) जन्म दिया। इन प्रारंभिक पत्रों के बाद 1823 में हमें बँगला भाषा के समाचारचंद्रिका और "संवाद कौमुदी", फारसी उर्दू के "जामे जहाँनुमा" और "शमसुल अखबार" तथा गुजराती के "मुंबई समाचार" के दर्शन होते हैं।
यह स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता बहुत बाद की चीज नहीं है। दिल्ली का "उर्दू अखबार" (1833) और मराठी का "दिग्दर्शन" (1837) हिंदी के पहले पत्र "उदंत मार्तंड" (1826) के बाद ही आए। "उदंत मार्तंड" के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी रहती थी, जिसे पत्र के संपादकों ने "मध्यदेशीय भाषा" कहा है। यह पत्र 1827 में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी "उदंत मार्तंड" को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।


हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण
1826 ई. से 1873 ई. तक को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं। 1873 ई. में भारतेंदु ने "हरिश्चंद्र मैगजीन" की स्थापना की। एक वर्ष बाद यह पत्र "हरिश्चंद्र चंद्रिका" नाम से प्रसिद्ध हुआ। वैसे भारतेंदु का "कविवचन सुधा" पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया था; परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में "हरिश्चंद्र मैगजीन" से ही हुआ। इस बीच के अधिकांश पत्र प्रयोग मात्र कहे जा सकते हैं और उनके पीछे पत्रकला का ज्ञान अथवा नए विचारों के प्रचार की भावना नहीं है। "उदंत मार्तंड" के बाद प्रमुख पत्र हैं : बंगदूत (1829), प्रजामित्र (1834), बनारस अखबार (1845), मार्तंड पंचभाषीय (1846), ज्ञानदीप (1846), मालवा अखबार (1849), जगद्दीप भास्कर (1849), सुधाकर (1850), साम्यदंड मार्तंड (1850), मजहरुलसरूर (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), ग्वालियर गजेट (1853), समाचार सुधावर्षण (1854), दैनिक कलकत्ता, प्रजाहितैषी (1855), सर्वहितकारक (1855), सूरजप्रकाश (1861), जगलाभचिंतक (1861), सर्वोपकारक (1861), प्रजाहित (1861), लोकमित्र (1835), भारतखंडामृत (1864), तत्वबोधिनी पत्रिका (1865), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (1866), सोमप्रकाश (1866), सत्यदीपक (1866), वृत्तांतविलास (1867), ज्ञानदीपक (1867), कविवचनसुधा (1867), धर्मप्रकाश (1867), विद्याविलास (1867), वृत्तांतदर्पण (1867), विद्यादर्श (1869), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (1869), अलमोड़ा अखबार (1870), आगरा अखबार (1870), बुद्धिविलास (1870), हिंदू प्रकाश (1871), प्रयागदूत (1871), बुंदेलखंड अखबर (1871), प्रेमपत्र (1872), और बोधा समाचार (1872)। इन पत्रों में से कुछ मासिक थे, कुछ साप्ताहिक। दैनिक पत्र केवल एक था "समाचार सुधावर्षण" जो द्विभाषीय (बंगला हिंदी) था और कलकत्ता से प्रकाशित होता था। यह दैनिक पत्र 1871 तक चलता रहा। अधिकांश पत्र आगरा से प्रकाशित होते थे जो उन दिनों एक बड़ा शिक्षाकेंद्र था, और विद्यार्थीसमाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शेष ब्रह्मसमाज, सनातन धर्म और मिशनरियों के प्रचार कार्य से संबंधित थे। बहुत से पत्र द्विभाषीय (हिंदी उर्दू) थे और कुछ तो पंचभाषीय तक थे। इससे भी पत्रकारिता की अपरिपक्व दशा ही सूचित होती है। हिंदीप्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में "बनारस अखबार" (1845) काफी प्रभावशाली था और उसी की भाषानीति के विरोध में 1850 में तारामोहन मैत्र ने काशी से साप्ताहिक "सुधाकर" और 1855 में राजा लक्ष्मणसिंह ने आगरा से "प्रजाहितैषी" का प्रकाशन आरंभ किया था। राजा शिवप्रसाद का "बनारस अखबार" उर्दू भाषाशैली को अपनाता था तो ये दोनों पत्र पंडिताऊ तत्समप्रधान शैली की ओर झुकते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1867 से पहले भाषाशैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे। इस वर्ष कवि वचनसुधा का प्रकाशन हुआ और एक तरह से हम उसे पहला महत्वपूर्ण पत्र कह सकते हैं। पहले यह मासिक था, फिर पाक्षिक हुआ और अंत में साप्ताहिक। भारतेंदु के बहुविध व्यक्तित्व का प्रकाशन इस पत्र के माध्यम से हुआ, परंतु सच तो यह है कि "हरिश्चंद्र मैगजीन" के प्रकाशन (1873) तक वे भी भाषाशैली और विचारों के क्षेत्र में मार्ग ही खोजते दिखाई देते हैं।


हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग : भारतेंदु युग
हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग 1873 से 1900 तक चलता है। इस युग के एक छोर पर भारतेंदु का "हरिश्चंद्र मैगजीन" था ओर नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा अनुमोदनप्राप्त "सरस्वती"। इन 27 वर्षों में प्रकाशित पत्रों की संख्या 300-350 से ऊपर है और ये नागपुर तक फैले हुए हैं। अधिकांश पत्र मासिक या साप्ताहिक थे। मासिक पत्रों में निबंध, नवल कथा (उपन्यास), वार्ता आदि के रूप में कुछ अधिक स्थायी संपत्ति रहती थी, परंतु अधिकांश पत्र 10-15 पृष्ठों से अधिक नहीं जाते थे और उन्हें हम आज के शब्दों में "विचारपत्र" ही कह सकते हैं। साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उनपर टिप्पणियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। वास्तव में दैनिक समाचार के प्रति उस समय विशेष आग्रह नहीं था और कदाचित् इसीलिए उन दिनों साप्ताहिक और मासिक पत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने जनजागरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भाग लिया था।
उन्नीसवीं शताब्दी के इन 25 वर्षों का आदर्श भारतेंदु की पत्रकारिता थी। "कविवचनसुधा" (1867), "हरिश्चंद्र मैगजीन" (1874), श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका" (1874), बालबोधिनी (स्त्रीजन की पत्रिक, 1874) के रूप में भारतेंदु ने इस दिशा में पथप्रदर्शन किया था। उनकी टीकाटिप्पणियों से अधिकरी तक घबराते थे और "कविवचनसुधा" के "पंच" पर रुष्ट होकर काशी के मजिस्ट्रेट ने भारतेंदु के पत्रों को शिक्षा विभाग के लिए लेना भी बंद करा दिया था। इसमें संदेह नहीं कि पत्रकारिता के क्षेत्र भी भारतेंदु पूर्णतया निर्भीक थे और उन्होंने नए नए पत्रों के लिए प्रोत्साहन दिया। "हिंदी प्रदीप", "भारतजीवन" आदि अनेक पत्रों का नामकरण भी उन्होंने ही किया था। उनके युग के सभी पत्रकार उन्हें अग्रणी मानते थे।


भारतेंदु के बाद
भारतेंदु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्म, (भारतमित्र, 1877), बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप, 1877), दुर्गाप्रसाद मिश्र (उचित वक्ता, 1878), पंडित सदानंद मिश्र (सारसुधानिधि, 1878), पंडित वंशीधर (सज्जन-कीर्त्ति-सुधाकर, 1878), बदरीनारायण चौधरी "प्रेमधन" (आनंदकादंबिनी, 1881), देवकीनंदन त्रिपाठी (प्रयाग समाचार, 1882), राधाचरण गोस्वामी (भारतेंदु, 1882), पंडित गौरीदत्त (देवनागरी प्रचारक, 1882), राज रामपाल सिंह (हिंदुस्तान, 1883), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण, 1883), अंबिकादत्त व्यास, (पीयूषप्रवाह, 1884), बाबू रामकृष्ण वर्मा (भारतजीवन, 1884), पं. रामगुलाम अवस्थी (शुभचिंतक, 1888), योगेशचंद्र वसु (हिंदी बंगवासी, 1890), पं. कुंदनलाल (कवि व चित्रकार, 1891), और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास (साहित्य सुधानिधि, 1894)। 1895 ई. में "नागरीप्रचारिणी पत्रिका" का प्रकाशन आरंभ होता है। इस पत्रिका से गंभीर साहित्यसमीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं। 1900 ई. में "सरस्वती" और "सुदर्शन" के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है।
इन 25 वर्षों में हमारी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई। प्रारंभिक पत्र शिक्षाप्रसार और धर्मप्रचार तक सीमित थे। भारतेंदु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं। उन्होंने ही "बालाबोधिनी" (1874) नाम से पहला स्त्री-मासिक-पत्र चलाया। कुछ वर्ष बाद महिलाओं को स्वयं इस क्षेत्र में उतरते देखते हैं - "भारतभगिनी" (हरदेवी, 1888), "सुगृहिणी" (हेमंतकुमारी, 1889)। इन वर्षों में धर्म के क्षेत्र में आर्यसमाज और सनातन धर्म के प्रचारक विशेष सक्रिय थे। ब्रह्मसमाज और राधास्वामी मत से संबंधित कुछ पत्र और मिर्जापुर जैसे ईसाई केंद्रों से कुछ ईसाई धर्म संबंधी पत्र भी सामने आते हैं, परंतु युग की धार्मिक प्रतिक्रियाओं को हम आर्यसमाजी और सनातनी पत्रों में ही पाते हैं। आज ये पत्र कदाचित् उतने महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने हमारी गद्यशैली को पुष्ट किया और जनता में नए विचारों की ज्योति भी। इन धार्मिक वादविवादों के फलस्वरूप समाज के विभिन्न वर्ग और संप्रदाय सुधार की ओर अग्रसर हुए और बहुत शीघ्र ही सांप्रदायिक पत्रों की बाढ़ आ गई। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न जातीय और वर्गीय पत्र प्रकाशित हुए और उन्होंने असंख्य जनों को वाणी दी।
आज वही पत्र हमारी इतिहासचेतना में विशेष महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने भाषा शैली, साहित्य अथवा राजनीति के क्षेत्र में कोई अप्रतिम कार्य किया हो। साहित्यिक दृष्टि से "हिंदी प्रदीप" (1877), ब्राह्मण (1883), क्षत्रियपत्रिका (1880), आनंदकादंबिनी (1881), भारतेंदु (1882), देवनागरी प्रचारक (1882), वैष्णव पत्रिका (पश्चात् पीयूषप्रवाह, 1883), कवि के चित्रकार (1891), नागरी नीरद (1883), साहित्य सुधानिधि (1894), और राजनीतिक दृष्टि से भारतमित्र (1877), उचित वक्ता (1878), सार सुधानिधि (1878), भारतोदय (दैनिक, 1883), भारत जीवन (1884), भारतोदय (दैनिक, 1885), शुभचिंतक (1887) और हिंदी बंगवासी (1890) विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन पत्रों में हमारे 19वीं शताब्दी के साहित्यरसिकों, हिंदी के कर्मठ उपासकों, शैलीकारों और चिंतकों की सर्वश्रेष्ठ निधि सुरक्षित है। यह क्षोभ का विषय है कि हम इस महत्वपूर्ण सामग्री का पत्रों की फाइलों से उद्धार नहीं कर सके। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, सदानं मिश्र, रुद्रदत्त शर्मा, अंबिकादत्त व्यास और बालमुकुंद गुप्त जैसे सजीव लेखकों की कलम से निकले हुए न जाने कितने निबंध, टिप्पणी, लेख, पंच, हास परिहास औप स्केच आज में हमें अलभ्य हो रहे हैं। आज भी हमारे पत्रकार उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने समय में तो वे अग्रणी थे ही।


तीसरा चरण : बीसवीं शताब्दी के प्रथम बीस वर्ष
बीसवीं शताब्दी की पत्रकारिता हमारे लिए अपेक्षाकृत निकट है और उसमें बहुत कुछ पिछले युग की पत्रकारिता की ही विविधता और बहुरूपता मिलती है। 19वीं शती के पत्रकारों को भाषा-शैलीक्षेत्र में अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उन्हें एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के पत्रों के सामने अपनी वस्तु रखनी थी। अभी हिंदी में रुचि रखनेवाली जनता बहुत छोटी थी। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और हम हिंदी पत्रों को साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करते पाते हैं। इस शताब्दी से धर्म और समाजसुधार के आंदोलन कुछ पीछे पड़ गए और जातीय चेतना ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का रूप ग्रहण कर लिया। फलत: अधिकांश पत्र, साहित्य और राजनीति को ही लेकर चले। साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में पहले दो दशकों में आचार्य द्विवेदी द्वारा संपादित "सरस्वती" (1903-1918) का नेतृत्व रहा। वस्तुत: इन बीस वर्षों में हिंदी के मासिक पत्र एक महान् साहित्यिक शक्ति के रूप में सामने आए। शृंखलित उपन्यास कहानी के रूप में कई पत्र प्रकाशित हुए - जैसे उपन्यास 1901, हिंदी नाविल 1901, उपन्यास लहरी 1902, उपन्याससागर 1903, उपन्यास कुसुमांजलि 1904, उपन्यासबहार 1907, उपन्यास प्रचार 19012। केवल कविता अथवा समस्यापूर्ति लेकर अनेक पत्र उन्नीसवीं शतब्दी के अंतिम वर्षों में निकलने लगे थे। वे चले रहे। समालोचना के क्षेत्र में "समालोचक" (1902) और ऐतिहासिक शोध से संबंधित "इतिहास" (1905) का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। परंतु सरस्वती ने "मिस्लेनी" () के रूप में जो आदर्श रखा था, वह अधिक लोकप्रिय रहा और इस श्रेणी के पत्रों में उसके साथ कुछ थोड़े ही पत्रों का नाम लिया जा सकता है, जैसे "भारतेंदु" (1905), नागरी हितैषिणी पत्रिका, बाँकीपुर (1905), नागरीप्रचारक (1906), मिथिलामिहिर (1910) और इंदु (1909)। "सरस्वती" और "इंदु" दोनों हमारी साहित्यचेतना के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक तरह से हम उन्हें उस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का शीर्षमणि कह सकते हैं। "सरस्वती" के माध्यम से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और "इंदु" के माध्यम से पंडित रूपनारायण पांडेय ने जिस संपादकीय सतर्कता, अध्यवसाय और ईमानदारी का आदर्श हमारे सामने रखा वह हमारी पत्रकारित को एक नई दिशा देने में समर्थ हुआ।
परंतु राजनीतिक क्षेत्र में हमारी पत्रकारिता को नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका। पिछले युग की राजनीतिक पत्रकारिता का केंद्र कलकत्ता था। परंतु कलकत्ता हिंदी प्रदेश से दूर पड़ता था और स्वयं हिंदी प्रदेश को राजनीतिक दिशा में जागरूक नेतृत्व कुछ देर में मिला। हिंदी प्रदेश का पहला दैनिक राजा रामपालसिंह का द्विभाषीय "हिंदुस्तान" (1883) है जो अंग्रेजी और हिंदी में कालाकाँकर से प्रकाशित होता था। दो वर्ष बाद (1885 में), बाबू सीताराम ने "भारतोदय" नाम से एक दैनिक पत्र कानपुर से निकालना शुरू किया। परंतु ये दोनों पत्र दीर्घजीवी नहीं हो सके और साप्ताहिक पत्रों को ही राजनीतिक विचारधारा का वाहन बनना पड़ा। वास्तव में उन्नीसवीं शतब्दी में कलकत्ता के भारत मित्र, वंगवासी, सारसुधानिधि और उचित वक्ता ही हिंदी प्रदेश की रानीतिक भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। इनमें कदाचित् "भारतमित्र" ही सबसे अधिक स्थायी और शक्तिशाली था। उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल और महाराष्ट्र लोक जाग्रति के केंद्र थे और उग्र राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी ये ही प्रांत अग्रणी थे। हिंदी प्रदेश के पत्रकारों ने इन प्रांतों के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और बहुत दिनों तक उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित नहीं हो सका। फिर भी हम "अभ्युदय" (1905), "प्रताप" (1913), "कर्मयोगी", "हिंदी केसरी" (1904-1908) आदि के रूप में हिंदी राजनीतिक पत्रकारिता को कई डग आगे बढ़ाते पाते हैं। प्रथम महायुद्ध की उत्तेजना ने एक बार फिर कई दैनिक पत्रों को जन्म दिया। कलकत्ता से "कलकत्ता समाचार", "स्वतंत्र" और "विश्वमित्र" प्रकाशित हुए, बंबई से "वेंकटेश्वर समाचार" ने अपना दैनिक संस्करण प्रकाशित करना आरंभ किया और दिल्ली से "विजय" निकला। 1921 में काशी से "आज" और कानपुर से "वर्तमान" प्रकाशित हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1921 में हिंदी पत्रकारिता फिर एक बार करवटें लेती है और राजनीतिक क्षेत्र में अपना नया जीवन आरंभ करती है। हमारे साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में भी नई प्रवृत्तियों का आरंभ इसी समय से होता है। फलत: बीसवीं शती के पहले बीस वर्षों को हम हिंदी पत्रकारिता का तीसरा चरण कह सकते हैं।


आधुनिक युग
1921 के बाद हिंदी पत्रकारिता का समसामयिक युग आरंभ होता है। इस युग में हम राष्ट्रीय और साहित्यिक चेतना को साथ साथ पल्लवित पाते हैं। इसी समय के लगभग हिंदी का प्रवेश विश्वविद्यालयों में हुआ और कुछ ऐसे कृती संपादक सामने आए जो अंग्रेजी की पत्रकारिता से पूर्णत: परिचित थे और जो हिंदी पत्रों को अंग्रेजी, मराठी और बँगला के पत्रों के समकक्ष लाना चाहते थे। फलत: साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ। राष्ट्रीय आंदोलनों ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के लिए योग्यता पहली बार घोषित की ओर जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों का बल बढ़ने लगा, हिंदी के पत्रकार और पत्र अधिक महत्व पाने लगे। 1921 के बाद गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुंच गया और उसके इस प्रसार में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योग दिया। सच तो यह है कि हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए नए कानून बनाकर समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलते हुए भी हमारे पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।
1921 के बाद साहित्यक्षेत्र में जो पत्र आए उनमें प्रमुख हैं स्वार्थ (1922), माधुरी (1923), मर्यादा, चाँद (1923), मनोरमा (1924), समालोचक (1924), चित्रपट (1925), कल्याण (1926), सुधा (1927), विशालभारत (1928), त्यागभूमि (1928), हंस (1930), गंगा (1930), विश्वमित्र (1933), रूपाभ (1938), साहित्य संदेश (1938), कमला (1939), मधुकर (1940), जीवनसाहित्य (1940), विश्वभारती (1942), संगम (1942), कुमार (1944), नया साहित्य (1945), पारिजात (1945), हिमालय (1946) आदि। वास्तव में आज हमारे मासिक साहित्य की प्रौढ़ता और विविधता में किसी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। हिंदी की अनेकानेक प्रथम श्रेणी की रचनाएँ मासिकों द्वारा ही पहले प्रकाश में आई और अनेक श्रेष्ठ कवि और साहित्यकार पत्रकारिता से भी संबंधित रहे। आज हमारे मासिक पत्र जीवन और साहित्य के सभी अंगों की पूर्ति करते हैं और अब विशेषज्ञता की ओर भी ध्यान जाने लगा है। साहित्य की प्रवृत्तियों की जैसी विकासमान झलक पत्रों में मिलती है, वैसी पुस्तकों में नहीं मिलती। वहाँ हमें साहित्य का सक्रिय, सप्राण, गतिशील रूप प्राप्त होता है।
राजनीतिक क्षेत्र में इस युग में जिन पत्रपत्रिकाओं की धूम रही वे हैं - कर्मवीर (1924), सैनिक (1924), स्वदेश (1921), श्रीकृष्णसंदेश (1925), हिंदूपंच (1926), स्वतंत्र भारत (1928), जागरण (1929), हिंदी मिलाप (1929), सचित्र दरबार (1930), स्वराज्य (1931), नवयुग (1932), हरिजन सेवक (1932), विश्वबंधु (1933), नवशक्ति (1934), योगी (1934), हिंदू (1936), देशदूत (1938), राष्ट्रीयता (1938), संघर्ष (1938), चिनगारी (1938), नवज्योति (1938), संगम (1940), जनयुग (1942), रामराज्य (1942), संसार (1943), लोकवाणी (1942), सावधान (1942), हुंकार (1942), और सन्मार्ग (1943)। इनमें से अधिकांश साप्ताहिक हैं, परंतु जनमन के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। जहाँ तक पत्र कला का संबंध है वहाँ तक हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि तीसरे और चौथे युग के पत्रों में धरती और आकाश का अंतर है। आज पत्रसंपादन वास्तव में उच्च कोटि की कला है। राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में "आज" (1921) और उसके संपादक स्वर्गीय बाबूराव विष्णु पराड़कर का लगभग वही स्थान है जो साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। सच तो यह है कि "आज" ने पत्रकला के क्षेत्र में एक महान् संस्था का काम किया है और उसने हिंदी को बीसियों पत्रसंपादक और पत्रकार दिए हैं।
आधुनिक साहित्य के अनेक अंगों की भाँति हमारी पत्रकारिता भी नई कोटि की है और उसमें भी मुख्यत: हमारे मध्यवित्त वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक औ राजनीतिक हलचलों का प्रतिबिंब भास्वर है। वास्तव में पिछले 140 वर्षों का सच्चा इतिहास हमारी पत्रपत्रिकाओं से ही संकलित हो सकता है। बँगला के "कलेर कथा" ग्रंथ में पत्रों के अवतरणों के आधार पर बंगाल के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवित्तीय जीवन के आकलन का प्रयत्न हुआ है। हिंदी में भी ऐसा प्रयत्न वांछनीय है। एक तरह से उन्नीसवीं शती में साहित्य कही जा सकनेवाली चीज बहुत कम है और जो है भी, वह पत्रों के पृष्ठों में ही पहले-पहल सामने आई है। भाषाशैली के निर्माण और जातीय शैली के विकास में पत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, परंतु बीसवीं शती के पहले दो दशकों के अंत तक मासिक पत्र और साप्ताहिक पत्र ही हमारी साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म देते और विकसित करते रहे हैं। द्विवेदी युग के साहित्य को हम "सरस्वती" और "इंदु" में जिस प्रयोगात्मक रूप में देखते हैं, वही उस साहित्य का असली रूप है। 1921 ई. के बाद साहित्य बहुत कुछ पत्रपत्रिकाओं से स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, परंतु फिर भी विशिष्ट साहित्यिक आंदोलनों के लिए हमें मासिक पत्रों के पृष्ठ ही उलटने पड़ते हैं। राजनीतिक चेतना के लिए तो पत्रपत्रिकाएँ हैं ही। वस्तुत: पत्रपत्रिकाएँ जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है।

Sunday, July 19, 2009

पश्चिमी मीडिया के दुष्प्रचार का शिकार भारत

पिछले महीनों में ब्रिटेन से निकलने वाले समाचार पत्रों न्यू सांइटिस्ट और न्यू स्टेट्समेन ने भारत के संबंध में व्याप्त रुढ़िबद्ध धारणा को चुनौती देते हुए विशेषांक छापे हैं।
जनवरी में न्यू स्टेट्समेन ने अपने ग्राहकों को यह प्रस्ताव दिया कि आपको नई महाशक्ति के आर्थिक उछाल से लेकर सेक्स क्रांति तक जानने की आवश्यकता हैं इसके पूर्व न्यू साइंटिस्ट ने अधिक मर्यादित तरीके से यह बताने परमाणु शक्ति व सेटेलाईट जैसी अत्याधुनिक तकनीके उपलब्ध हैं, बिल्कि वह उनका उपयोग अपने समाज के निर्धनतम लोगों के विकास के लिए भी कर रहा हैं। उसने इस बात की ओर भी इंगित किया कि भारत के राष्ट्रपति जो कि एक मुस्लिम है, अंतरिक्ष और परमाणु विज्ञान दोनों विषयों के विशेषज्ञ भी हैं।
इस तरह के प्रकाशनों ने भारत से संबंधित उस रुढ़िबद्ध धारणा को चुनौती दी है जिसके अनुसार भारत एक पिछड़ा, अंधविश्वासी एवं गरीबी आदि व्याधियों से ग्रसित राष्ट्र है। परन्तु हमारे पास इस बात के वास्तविक प्रमाण मौजूद हैं कि किस प्रकार नई तकनीक दूरस्थ समुदायों को बजली, प्राथमिक शिक्षा, इन्टरनेट इत्यादि उपलब्ध करवा रही हैं । परन्तु विश्व के कई हिस्सों खासकर गरीब देशों में जो कुछ घटित हो रहा है उसकी एक संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करना अभी भी एक गतिशील संघर्ष ही है।
कुछ दिनों पूर्व दी इंडिपेंडेंट ने एक बड़ा लेख छापा था जिसमें यह दावा किया गया था कि भारत को किसी भी यूरोपियन देश की बनिस्बत अत्यधिक ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। इस वक्तव्य को अगर इसके वास्तविक स्वरुप में ग्रहण करें तो यह वक्तव्य बहुत ही बेचैन कर देने वाला प्रतीत होता हैं। पर गौर करने पर यह तर्क ही ढेर हो जाता है। तो मैंने समाचार पत्र को इस बिन्दु की ओर इशारा करते हुए लिखा, एक अरब से ज्यादा की जनसंख्या वाले भारत की तुलना किसी एक यूरोपीय देश से नहीं बल्कि संपूर्ण यूरोप से करना चाहिए।
उत्तरी अमेरिका के निवासियों की तुलना में भारत का नागरिक मात्र १० प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड उत्पन्न करता हैं। वास्तविकता यह भी है कि एक ब्रिटिश बच्चा, जी-८ देशों के अतिरिक्त अन्य किसी भी देश के बच्चे की बनिस्बत विश्व के प्राकृतिक संसाधनों का ८ गुना ज्यादा उपभोग करता है।
हाल ही में इसी समाचार पत्र ने घोषणा की कि दो बड़े वैज्ञानिकों के अनुसार अधिक जनसंख्या इस ग्रह के लिए खतरा हैं। इन दोनों वैज्ञानिकों का यह दृढ़ विश्वास है कि यह एक साधारण सा सच है, जिसकी राजनीति के कारण या तो अनदेखी की गई है या महत्व नहीं दिया गया। इस आक्षेप के प्रत्युत्तर में मैंने एक लिफाफे के पीछे कुछ गणनाएं की और इस संशोधन के साथ समचार पत्र के कार्यालय को भेजा। अगर आप सारी विश्व की जनसंख्या को अमेरिका में भेज दें तो वहां पर जनसंख्या का घनत्व हालैंड की जनसंख्या के घनत्व जितना होगा और डच निवासियों के पास अपने मनपसंद ट्यूलिप (एक प्रकार के फूल) उगाने के लिए भरपूर स्थान फिर भी शेष रहेगा।
अब भारत के बारे में कुछ अच्छे समाचार ? भारत के कुछ बड़े शहरों में अब यह कानूनन अनिवार्य हो गया है कि वहां पर चलने वाले वाहन सी.एन.जी. ही इंर्धन के रुप में इस्तेमाल कर सकेंगग। इससे श्वास संबंधी रोगों में जबरदस्त कमी आई हैं । पर इस संदर्भ को आपने कभी ब्रिटिश अखबारों या टेलीविजन में होते देखा है? निश्चित तौर पर नहीं, क्योंकि किसी को भी कार उद्योग की उच्चाकांक्षा को चुनौती देने का मौका है ही नहीं।
भारत द्वारा ऐसे व्यापक पर्यावरणीय कानूनों का निर्माण कर पाना इसलिए संभव हो पाया है कि यहां का सर्वोच्य न्यायालय इसमें सीधे हस्तक्षेप करता है। और जिसके पास काफी मात्रा में शक्तियां निहित हैें।
पर्यावरण के मसले पर भी भारत कम राजनीतिक स्तर पर तो एक विश्व नेता है। १९७२ में सम्पन्न संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रथम पर्यावरणीय सम्मेलन में भागीदारी करने वाली भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक मात्र राष्ट्र प्रमुख थी। १९८१ में आयोजित नए एवं पुर्नसंशोधित की जा सकने वाली ऊर्जा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संध के सम्मेलन में भी जिन तीन राष्ट्रप्रमुखों ने भाग लिया था इंदिरा गांधी उनमें से भी एक थीं। १९७० और १९८० के दशकों में पर्यावरण और विकास को लेकर भारत के सरोकारों में और भी परिपक्वता आई। प्रोजेक्ट टाइगर ओर उनके नए राष्ट्रीय पार्क इसी के उदाहरण हैं। पर रुढ़ीबद्ध धारणा अपनी जगह बनी हुई है। अगर व्यक्ति सामूहिक रुप से इसका विरोध करेंगे तभी इस प्रवृत्ति में परिवर्तन आ सकता है, क्योंकि ज्यादातर लोग तो अनजान हैं और उन्हें निहित स्वार्थो, राजनीतिक स्वार्थ और सामुहिक असंयम द्वारा बरगलाया जाता है।
अगर हम पश्चिम के निवासी स्वयं को इस बात के लिए संतुष्ट कर लेंगे कि तथाकथित विकासशीत विश्व के लोगों को अधिक जनसंख्या, भू-मंडलीय तापमान वृद्धि, महामारियेां और अन्य प्रमुख समस्याओं के लिए दोषी ठहराया जा सकता है तो भी यह उनके (विकासशील देशों) पर ही निर्भर है कि वे अपना रास्ता बदलें, बजाए इसके की हमें उनके लिए कुछ करने की आवश्यकता पड़े। वास्तव में प्रभावशाली उपभोक्तावादी औद्योगिक विश्व और गैर औद्योगिक देशों के कुछ शहरी क्षेत्र हमारे इस वर्तमान भूमंडलीय संकट के लिए जिम्मेदार हैं। उनके लिए इस तरह की रुढ़िबद्ध धारणाओं को बल देकर हमें इस बात का विश्वास दिला देना आसान है, जिससे कि हम सारा दोष उन विकासशील देशों पर मढ़ दें और हम सब अपनी जीवनचर्या में किसी भी प्रकार के परिवर्तन को प्रवृत्त ही न हों।

संरक्षण मुहिम बनी बाघों की मुसीबत

बाघों का कुनबा बढ़ाने की अफ़लातूनी कवायद से मध्यप्रदेश के प्रकृति प्रेमी खासे नाराज़ और वन्य जीव विशेषज्ञ हैरान हैं। बाघों की तादाद बढाने के लिए शुरु की गई मुहिम को लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन वन विभाग के आला अफ़सरान इन आपत्तियों को सिरे से खारिज कर बाघों की संख्या बढाने की दुहाई दे रहे हैं। ये और बात है कि जब से प्रोजेक्ट टाइगर शुरु हुआ है बाघों की मौत का सिलसिला तेज़ हो गया है। गोया यह परियोजना बाघों की मौत सुनिश्चित करने के लिए ही बनाई गई है।
हेलीकॉप्टर से बाघिन पहुँचाने की परियोजना सरिस्का के बाद अब मध्यप्रदेश में भी शुरु की गई है। लेकिन परियोजना का उद्देश्य अपनी मोटी बुद्धि में तो घुसता ही नहीं। इधर प्रदेश में बाघों की वंशवृद्धि के लिए नई तरकीबें आज़मायी जा रही हैं, उधर बाघों की मौतों के बढते ग्राफ़ ने तमाम सवाल भी खड़े कर दिये हैं।
हाल ही में सुरक्षा के सख्त इंतज़ाम के बीच वायुसेना के उड़नखटोले से बाघिन को पन्ना लाया गया। कान्हा नेशनल पार्क में सैलानियों को लुभा रही बाघिन अब अपने पिया के घर पन्ना नेशनल पार्क की रौनक बन गई है। इससे पहले तीन मार्च को बाँधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में गुमनाम ज़िन्दगी गुज़ार रही बाघिन सड़क के रास्ते पन्ना पहुँची। पन्ना के बाघ महाशय के लिए पाँच दिनों में दो बाघिन भेजकर वन विभाग योजना की सफ़लता के “दिवा स्वप्न” देख रहा है।
मध्यप्रदेश में आए दिन बाघों के मरने की खबरें आती हैं। पिछले हफ़्ते कान्हा नेशनल पार्क में एक बाघ की मौत हो गई। वन विभाग ने स्थानीय संवाददाताओं की मदद से इस मौत को दो बाघों की लड़ाई का नतीजा बताने में ज़रा भी वक्त नहीं लगाया। वीरान घने जंगल में मरे जानवर की मौत के बारे में बिना किसी जाँच पड़ताल के तुरंत उसे बाघों का संघर्ष करार दे देना ही संदेह की पुष्टि का आधार बनता है । खैर, वन विभाग के जंगल नेताओं और अधिकारियों की चारागाह में तब्दील हो चुके हैं, अब इसमें कहने- सुनने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रहा।
पिछले दो माह के दौरान कान्हा में बाघ की मौत की यह तीसरी घटना है। इसी अवधि में बाँधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में भी बाघ की मौत हो चुकी है। बुधवार को इंदौर चिड़ियाघर में भी “बाँके” नाम के बाघ ने फ़ेंफ़ड़ों में संक्रमण के कारण एकाएक दम तोड़ दिया। भोपाल के राष्ट्रीय वन विहार में भी अब तक संभवतः तीन से ज़्यादा बाघों की मौत हो चुकी हैं । पन्ना नेशनल पार्क में बाघों की तादाद तेज़ी से घटी है। वर्ष 2005 में यहाँ 34 बाघ थे। इनमें 12 नर और 22 मादा थीं। 2006-2007 की भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून की गणना में यह आँकड़ा 24 रह गया।
बाघिन को स्थानांतरित करने की मुहिम पर स्थानीय लोगों ने ही नहीं , देश के जानेमाने वन्यजीव विशेषज्ञों ने भी आपत्ति उठाई है। उन्होंने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को खत लिखकर अभियान रोकने की गुज़ारिश की थी । वन्य संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ बृजेन्द्र सिंह ,वाल्मिक थापर, डॉक्टर उल्हास कारंत, डॉक्टर आर. एस. चूड़ावत, पी. के. सेन, बिट्टू सहगल, फ़तेह सिंह राठौर और बिलिन्डा राइट ने बाघिन को बाँधवगढ़ से पन्ना ले जाने के बाद 7 मार्च को पत्र भेजा था। इसमें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और जानेमाने बाघ विशेषज्ञों से इस मुद्दे पर राय मशविरा नहीं करने पर एतराज़ जताया गया है।
विशेषज्ञों ने वन कानून और अपने अनुभव के आधार पर कई अहम मुद्दे रखे हैं, जिनके मुताबिक पन्ना की मौजूदा परिस्थितियाँ बाघिनों के स्थान परिवर्तन के लिए कतई अनुकूल नहीं हैं। साथ ही ऎसा मुद्दा भी उठाया है जो वन विभाग की पूरी कवायद पर ही सवालिया निशान लगाता है। पत्र में पिछले एक महीने में पन्ना टाइगर रिज़र्व में किसी भी बाघ के नहीं दिखने का ज़िक्र किया गया है।
हालाँकि पूरी कवायद फ़िलहाल अँधेरे में तीर चलाने जैसी है। जो सूरते हाल सामने आए हैं, उसके मुताबिक वन विभाग ही आश्वास्त नहीं है कि पन्ना में कोई बाघ बचा भी है या नहीं ….? तमाम विरोध और भारी मशक्कत के बीच दो बाघिनें पन्ना तक तो पहुँच गईं, मगर नेशनल पार्क में नर बाघ होने को लेकर वन विभाग भी संशय में है। दरअसल पार्क का इकलौता नर बाघ काफ़ी दिनों से नज़र नहीं आ रहा है।
प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉक्टर पी. बी. गंगोपाध्याय का कहना है कि ज़रुरी हुआ तो एक-दो नर बाघ भी पन्ना लाये जा सकते हैं। बाघों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए पिछले दिनों भारतीय वन्यजीव संस्थान ने कैमरे लगाये थे , जिनसे पता चला कि पार्क में सिर्फ़ एक ही बाघ बचा है।
बाघ संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे बाँधवगढ़ फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष पुष्पराज सिंह इस वक्त बाघिन के स्थानांतरण को जोखिम भरा मानते हैं । गर्मियों में पन्ना के जलाशय सूख जाने से बाघों को शाकाहारी वन्यजीवों का भोजन मिलना दूभर हो जाता है । ऎसे में वे भटकते हुए गाँवों के सीमावर्ती इलाकों में पहुँच जाते हैं और कभी शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं या फ़िर ग्रामीणों के हाथों मारे जाते हैं । कान्हा की बाघिन को पन्ना ले जाने से रोकने में नाकाम रहे वन्यप्राणी प्रेमियों ने अब बाघिन की सुरक्षा को मुद्दा बना लिया है । अधिकारियों की जवाबदेही तय कराने के लिए हाईकोर्ट में अर्ज़ी लगाई गई है ।
जानकारों का ये तर्क एकदम जायज़ लगता है कि पन्ना को सरसब्ज़ बनाने का सपना देखने और इसकी कोशिश करने का वन विभाग को हक तो है, मगर साथ ही यह दायित्व भी है कि वह उन कारणों को पता करे जो पन्ना से बाघों के लुप्त होने का सबब बने । बाहर से लाये गये बाघ-बाघिनों की हिफ़ाज़त के लिहाज़ से भी इन कारणों का पता लगना बेहद ज़रुरी हो जाता है।
मध्यप्रदेश के वन विभाग के अफ़सरों की कार्यशैली के कुछ और नमूने पेश हैं,जो वन और वन्य जीवों के प्रति उनकी गंभीरता के पुख़्ता सबूत हैं -सारे भारत में वेलंटाइन डे को लेकर हर साल बवाल होता है, लेकिन वन विभाग के उदारमना अफ़सरों का क्या कीजिएगा जो वन्य प्राणियों के लिए भी “वेलंटाइन हाउस” बनवा देते हैं। भोपाल के वन विहार के जानवर पर्यटकों की आवाजाही से इस कदर परेशान रहते हैं कि वे अपने संगी से दो पल भी चैन से मीठे बोल नहीं बोल पाते। एकांत की तलाश में मारे-मारे फ़िरते इन जोड़ों ने एक दिन प्रभारी महोदय के कान में बात डाल दी और उन महाशय ने आनन-फ़ानन में तीन लाख रुपए ख़र्च कर इन प्रेमियों के मिलने का ठिकाना “वेलंटाइन हाउस” खड़ा करा दिया । कुछ सीखो बजरंगियों, मुथालिकों, शिव सैनिकों….। प्रेमियों को मिलाने से पुण्य मिलता है और अच्छी कमाई भी होती है।
इन्हीं अफ़सर ने वन्य प्राणियों की रखवाली के लिए वन विहार की ऊँची पहाड़ी पर दस लाख रुपए की लागत से तीन मंज़िला वॉच टॉवर बनवा दिया। भोपाल का वन विहार यूँ तो काफ़ी सुरक्षित है, लेकिन जँगली जानवर होते बड़े चालाक हैं। वन कर्मियों की नज़र बचा कर कभी भालू, तो कभी बंदर, तो कभी मगर भोपालवासियों से मेल मुलाकात के लिए निकल ही पड़ते हैं। तिमँज़िला वॉच टॉवर पर टँगा कर्मचारी बेचारा चिल्लाता ही रह जाता है।

देश में बाघों की संख्या में गिरावट आयी


समूचे देश में बाघों की ताजा गणना के आज जारी अनुमानों के अनुसार देश में बाघों की संख्या में गिरावट आयी है और उनकी संख्या वर्ष 2001 में 3642 से घटकर लगभग 1500 हो गई हैपर्यावरण और वन मंत्रालय ने कहा कि वर्ष 2001 और वर्ष 2007 के आंकडों की तुलना नहीं.नही.की जा सकती क्योंकि गणना की पद्धति एकदम अलग अलग थी1भारतीय वन्यजीव संस्थान की गणना रिपोर्ट को वन राज्यमंत्री एस रघुपति ने आज यहां जारी कियाराष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के डा राजेश गोपाल ने कहा कि देश में बाघों की कुल संख्या 1411 थी.जिसमें 17.43 प्रतिशत कमी या वृद्धि हो सकती है और न्यूनतम1165 और ऊपरी सीमा1657 है1देश के अन्य राज्यों की गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 109.उत्तराखंड 170.बिहार 10.आंध्रपदेश 75.छत्तीसगढ 26.मध्यप्रदेश 300.महाराष्ट्र 103.उडीसा 45.राजस्थान 32.कर्नाटक 290.केरल 46.तमिलनाडु 76.असम 70.अरुणाचल प्रदेश 14.मिजोरम06.और पश्चिम बंगाल में 10 बाघ हैउन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में विशेष परिस्थिति के कारण बाघों की गणना की प्रक्रिया अभी भी जारी है1 छत्तीसगढ के इन्द्रावती बाघ अभयारण्य औरारखंड के पलामू बाघ अभयारण्य में नक्सली आंदोलन के कारण सम्पर्क के अभाव में गणना नहीं.नहीं.हो पायी है

20वीं सदी में 39 हजार बाघ विलुप्त


पूरी दुनिया में बाघों के अस्तित्व पर संकट मंडराया हुआ है। पिछली सदी में इंडोनेशिया में बाघ की तीन उप प्रजातियों का पूरी तरह सफाया हो गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी 20वीं सदी में 39 हजार बाघ विलुप्त हो गए।वर्तमान सदी में भी यह संकट लगातार बना हुआ है और देश का राष्ट्रीय पशु अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।एक अनुमान के मुताबिक पिछली सदी में भारतीय उपमहाद्वीप से 39 हजार बाघ गायब हो गए।बाघों की संख्या में निरंतर हो रहे ह्मस की वजह से ही 1970 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय पशु के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद शिकारी अपने इरादों में लगातार कामयाब हो रहे हैं।हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा कराई गई गणना से खुलासा हुआ है कि मात्र पिछले छह साल में ही भारत में बाघों की 50 फीसदी संख्या कम हो चुकी है।बाघों के जीवन पर आसन्न खतरे के चलते ही 1972 में पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पास कराया था। इसके बाद बाघ को संरक्षित प्रजातियों की सूची में डाल दिया गया।वर्ष 1972 में ही पहली बार बाघों की आधिकारिक गणना कराई गई थी जिसमें इनकी संख्या मात्र 1827 निकली। वर्ष 2001 में बाघों की संख्या में इजाफा नजर आया और उनकी आबादी 3642 बताई गई लेकिन छह साल के बाद जब इस वर्ष इनकी गणना हुई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने 2007 की गणना में इनकी संख्या सिर्फ 1300 से 1500 के बीच बताई है। हाल ही की गणना से पता चला है कि अकेले मध्य प्रदेश में 65 प्रतिशत बाघ धरती से विलुप्त हो गए हैं। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान में क्रमश: 100-100 से भी कम बाघ बचे हैं।वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ की गिनती का काम उनके पंजों के निशान के आधार पर किया जाता है, लेकिन कई बार बाघ एक ही जगह से बार-बार गुजरते हैं जिससे उनके पंजों की संख्या बढ़ जाती है। इस कारण हो सकता है कि इनकी संख्या वर्तमान आंकड़े से और भी कम हो।

कैसे बचेगा मध्यप्रदेश का 'टाइगर स्टेट' का दर्जा



प्रदेश में वयस्क बाघों की संख्या 264 है और बच्चों को मिलाकर इनकी संख्या 336 है। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा पिछले साल की गई गणना पर आधारित आँकड़े हैं। हालाँकि वन्यजीव विशेषज्ञ अब भी मध्यप्रदेश के जंगलों को बाघों के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ मानते हैं

भारत का हृदय स्थल मध्यप्रदेश अपने शानदार जंगलों और राष्ट्रीय पशु बाघ की 'दहाड़दार' मौजूदगी के कारण जाना जाता है। बाघों की शानदार आबादी के कारण मध्यप्रदेश को 'टाइगर स्टेट' का दर्जा मिला हुआ है। प्रदेश में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए बाघ मुख्य आकर्षण का केन्द्र रहता है। कान्हा, बाँधवगढ़, पेंच, पन्ना और सतपुड़ा जैसी बाघ परियोजनाएँ और राष्ट्रीय उद्यान मध्यप्रदेश में हैं और यहाँ के आकर्षण में चार चाँद लगाते हैं।
NDलेकिन अब इन सब पर खतरे के बादल मँडरा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे यहाँ के जंगलों पर संकट है। आजादी के बाद इस प्रदेश में जंगल जहाँ कुल भूभाग का 40 प्रतिशत से ज्यादा थे वहीं अब ये सिमटकर 20 प्रतिशत से भी कम रह गए हैं। यही हाल कुछ शानदार जानवर बाघ का भी हो रहा है। पिछले दशक के अंत तक मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या 700 से भी ज्यादा थी। वहीं अब ये घटकर 300 के आसपास रह गए हैं।
प्रदेश में वयस्क बाघों की संख्या 264 है और बच्चों को मिलाकर इनकी संख्या 336 है। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा पिछले साल की गई गणना पर आधारित आँकड़े हैं। हालाँकि वन्यजीव विशेषज्ञ अब भी मध्यप्रदेश के जंगलों को बाघों के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ मानते हैं
बारीकी से देखें तो प्रदेश में वयस्क बाघों की संख्या 264 है और बच्चों को मिलाकर इनकी संख्या 336 है। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा पिछले साल की गई गणना पर आधारित आँकड़े हैं। हालाँकि वन्यजीव विशेषज्ञ अब भी मध्यप्रदेश के जंगलों को बाघों के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ मानते हैं लेकिन इस प्रदेश का वन विभाग और सरकार इस खूबसूरत जानवर को लेकर गंभीर नहीं है और इसे खोने पर तुली है। अब तो मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भी प्रदेश सरकार से पूछ लिया है कि वो बाघों को बचाने के प्रति कितनी गंभीर है और इस दिशा में उसने क्या कदम उठाया। प्रदेश सरकार को हाईकोर्ट के इस प्रश्न का उत्तर देना अभी बाकी है। कहा जा सकता है कि अगर लापरवाही का यही हाल चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब मध्यप्रदेश अपने 'टाइगर स्टेट' का दर्जा खो बैठेगा। देशभर में हो रही है बाघों की संख्या में कमी : पिछले साल देश में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई थी। भारत के इतिहास में अब तक सबसे कम बाघ पिछले साल ही दर्ज हुए थे। 1997 में देश में जहाँ 3508 बाघ थे, वहीं दस साल बाद 2008 में इनकी संख्या घटकर मात्र 1411 हो गई। यह अभूतपूर्व कमी थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने तुरंत कदम उठाते हुए देश में 'प्रोजेक्ट टाइगर' परियोजना शुरू करवाई थी। देश में अब 28 'प्रोजेक्ट टाइगर' रिजर्व हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए थे और 1997 में बाघों की संख्या साढ़े तीन हजार से भी ज्यादा हो गई
यह संख्या 1972 में हुई बाघ गणना के आँकड़ों से भी कम थी जब देश में इस राष्ट्रीय पशु की संख्या घटकर महज 1827 रह गई थी। उस दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने तुरंत कदम उठाते हुए देश में 'प्रोजेक्ट टाइगर' परियोजना शुरू करवाई थी। देश में अब 28 'प्रोजेक्ट टाइगर' रिजर्व हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए थे और 1997 में बाघों की संख्या बढ़कर साढ़े तीन हजार से भी ज्यादा हो गई। 2001-02 में भी ये 3642 बनी रही लेकिन अंततः नई शताब्दी का पहला दशक इस धारीदार जानवर के लिए घातक सिद्ध हुआ और इस दशक के अंत तक ये सिमटकर सिर्फ 1411 रह गए। फरवरी 2008 में बाघों की यह गणना देशभर में भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने की थी। उल्लेखनीय है कि आजादी के ठीक बाद यानी 1947 में भारत में 40000 बाघ थे। बाघों की इस संख्या को लेकर भारत पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था लेकिन बढ़ती आबादी, लगातार हो रहे शहरीकरण, कम हो रहे जंगल और बाघ के शरीर की अंतरराष्ट्रीय कीमत में भारी बढ़ोतरी इस खूबसूरत जानवर की जान की दुश्मन बन गई। सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में घटे : 2008 में हुई गणना से पहले मध्यप्रदेश वन विभाग प्रदेश में 700 से ज्यादा बाघ होने के दावे किया करता था लेकिन इस गणना के बाद उन सब दावों की हवा निकल गई और असली संख्या 264 से 336 सामने आई। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार इस गणना में पता चला है कि सबसे ज्यादा बाघ मध्यप्रदेश में ही कम हुए हैं। कम होने या गायब होने वाले बाघों की संख्या 400 के आसपास है। आशंका जताई गई कि इनमें से ज्यादातर का शिकार कर लिया गया और उनके अंग दूसरे देशों को बेच दिए गए। 2009 इस जानवर के लिए और भी कड़ी परीक्षा वाला साबित होने वाला है क्योंकि शिकारियों की संख्या जहाँ लगातार बढ़ रही है वहीं बाघों की संख्या और उनका इलाका लगातार कम हो रहा है। पन्ना में हुआ घोटाला सामने आया : मध्यप्रदेश का राष्ट्रीय उद्यान पन्ना बाघों के खत्म होने का सबसे पहला प्रतीक बना है। 2007 में वन विभाग ने यहाँ 24 बाघ होने का दावा किया था। पिछले साल भारतीय वन्यजीव संस्थान की टीम ने यहाँ 8 बाघ होने की बात कही लेकिन रघु चंदावत जैसे स्वतंत्र बाघ विशेषज्ञ ने यहाँ सिर्फ एक बाघ की मौजूदगी बताई। बाघिन का यहाँ नामोनिशान तक नहीं मिला। वन्यजीव संस्थान के कैमरों में भी सिर्फ एक बाघ की तस्वीर आई। विशेषज्ञों के अनुसार ये अकेला बाघ यहाँ अपना परिवार नहीं बढ़ा पाएगा और पन्ना भी सरिस्का की राह चलकर अपने बाघों से हाथ धो बैठेगा। अब प्रदेश का वन विभाग सरिस्का की तर्ज पर यहाँ बाँघवगढ़ से एक बाघिन लाकर छोड़ने पर विचार कर रहा है ताकि ये बाघ-बाघिन प्रजनन कर अपनी आबादी बढ़ा सकें और ये राष्ट्रीय उद्यान 'बाघविहीन' होने से बच सके।इस बारे में मध्यप्रदेश के पीसीसीएफ और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक एचएस पाबला कहते हैं कि हमने मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ाने की व्यापक कार्ययोजना बनाई है। हम इसके लिए प्रयासरत हैं। पन्ना में बाँधवगढ़ से बाघिन को लाकर छोड़ने की कार्ययोजना पर भी काम चल रहा है। इस साल हम बाघों की संख्या बढ़ाने में जरूर कामयाब होंगे।

विधानसभा में बाघ


भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में आज प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रदेश में बाघों की संख्या में कमी का मामला उठाया। वन राज्य मंत्री के जवाब से असंतुष्ट विधायकों ने नारेबाजी करते हुए दोषी अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाते हुए सदन से वाकआउट किया।
यह मामला कांग्रेस के चौधरी राकेश सिंह, डा.गोविंद सिंह और अजय सिंह ने उठाया था।
उनका आरोप था कि बाघों के संरक्षण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पर्याप्त राशि दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार गंभीर नहीं है और पन्ना टाइगर रिजर्व में अब एक भी बाघ नहीं बचा है।
वन राज्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने स्वीकार किया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में पूरे प्रयासों के बावजूद बाघों की संख्या कम होती गई और मई 09 में भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए आंकलन में कोई बाघ नहीं पाया गया।
उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा पन्ना में बाघों की पुनस्र्थापना के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई है, जिसके तहत दो बाघिन अन्य राष्ट्रीय उद्यान से लाकर बसाई जा चुकी हैं। जबकि चार अन्य बाघ बाघिन को लाने की अनुमति भारत शासन से प्राप्त हो चुकी है।
शुक्ल ने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या कम होने का मुख्य कारण वर्षो से बाघ प्रजनन का अभाव तथा नर मादा अनुमात में असंतुलन होना है।
उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत शासन द्वारा गठित विशेष जांच समिति द्वारा अवैध शिकार को भी राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों के खत्म होने का मुख्य कारण माना गया है।
उन्होंने बताया कि राज्य शासन द्वारा इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघों के विलुप्त होने के जैविक तथा प्रशासनिक कारणों का अध्ययन करने के लिए तथा भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए समिति का गठन किया गया है।
वन राज्य मंत्री ने इस संबंध में अधिकारियों के खिलाफ तत्काल निलंबन जैसी कार्रवाई करने से इंकार करते हुए कहा कि इस संबंध में गठित समिति की रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई की जाएगी।
शुक्ल ने बताया कि बाघों की गिनती में 18 माह तक के शावकों को शामिल नहीं किया जाता है। इसलिए शावकों की स्थिति बताना संभव नहीं है।
उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार प्रोजक्ट टाइगर के माध्यम से राज्य सरकार को राशि उपलब्ध कराती है और इस वर्ष 60 करोड़ रुपए की राशि मिली है। कांग्रेस के अजय सिंह का कहना था कि वर्ष 2003 में जब भाजपा की सरकार सत्ता में आई थी, तब प्रदेश में बाघों की संख्या 700 थी, लेकिन उचित संरक्षण के अभाव में बाघ कम होते गए और आगे भी यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी।
सिंह ने कहा कि कुख्यात डकैत ठोकिया 16 माह से भी अधिक समय तक पन्ना टाइगर रिजर्व में रहा और उसी दौरान बाघों की संख्या में भारी कमी आई।
विपक्ष की नेता जमुना देवी ने राज्य सरकार के जवाब को असंतोषपूर्ण करार देते हुए कहा कि सरकार बाघों को बचाने की अपेक्षा दोषी अधिकारियों को बचाने में लगी है। इसी दौरान कांग्रेस सदस्यों ने प्लास्टिक के बैनर ओढ़ लिए, जिसमें बाघ के चित्र के दोनों तरफ मुझे बचाओ मुझे बचाओं लिखा हुआ था।
कांग्रेस सदस्यों ने सरकार पर दोषी अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाते हुए सदन से वाकआउट किया। लेकिन विधान सभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी ने कांग्रेस के प्लास्टिक के बैनर ओढ़ने के कृत्य पर अप्रसन्नता जताई।

बाघों की संख्या आधी


पाँच वर्षों में 400 से अधिक बाघ लापता हो चुकेभारत में बाघों की संख्या आधी हुई भारत सरकार ने बाघों की ताज़ा आंकड़े जारी किए हैं जिनके अनुसार बाघों की संख्या आधी हो गई है.राष्ट्रीय बाघ संरक्षण ऑथारिटी के सचिव राजेश गोपाल ने बताया,'' सन् 2002 के सर्वेक्षण में बाघों की संख्या 3500 आंकी गई थी लेकिन ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 1411 बाघ बचे हैं.'' हालांकि सरकार का कहना है कि पिछले आंकड़े सही नहीं थे. राजेश गोपाल का कहना था कि इस बार बाघों की संख्या के लिए नया तरीका अपनाया गया. पिछली बार पैरों के निशान के आधार पर इनकी संख्या का निर्धारण किया गया था जिसमें चूक की गुजांइश थी. उनका कहना था,'' अब बाघ केवल देश के 17 राज्यों में पाए जाते हैं और वे केवल बाघ संरक्षित क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं.''घटती संख्या पर चिंतामध्य प्रदेश में इनकी संख्या सबसे अधिक 300 है. उत्तराखंड में 178, उत्तर प्रदेश में 109 और बिहार में 10 बाघ होने का अनुमान हैं.इसी तरह आंध्र प्रदेश में 95, छत्तीसगढ़ में 26, महाराष्ट्र में 103, उड़ीसा में 45 और राजस्थान में 32 बाघ होने का आकलन किया गया है. इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाघों की कम होती संख्या पर चिंता प्रकट की थी और कहा था कि कि जंगलों पर जनसंख्या का दबाव कम करने के प्रयास किए जाएँ. इसके बाद बाघों की रक्षा के लिए भारत सरकार ने एक कार्यदल का गठन किया था और पर्यावरणविद् सुनीता नारायण को उसका प्रमुख बनाया गया था. अवैध शिकार और घटते जंगलों को इसका सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संरक्षण के उपायों के बावजूद बाघों की संख्या लगातार घट रही है. माना जा रहा है कि उल्लेखनीय है कि विश्व के 40 प्रतिशत बाघ भारत में रहते हैं.